IGNOU BOOK | Asmitamoolak Vimersh aur hindi sahitya | HINDI MEDIUM | BHDE - 141
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अस्मितामूलक विमर्श और हिंदी साहित्य
अस्मितामूलक विमर्श का अर्थ उन सामाजिक समूहों की पहचान, अधिकार, अनुभव, संघर्ष और सम्मान से जुड़े प्रश्नों पर विचार करना है, जिन्हें लंबे समय तक साहित्य और समाज में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिला। हिंदी साहित्य में इस विमर्श ने साहित्य को अधिक लोकतांत्रिक, समावेशी और बहुआयामी बनाया है।
अस्मिता का अर्थ
अस्मिता का अर्थ है—व्यक्ति या समुदाय की अपनी पहचान और अस्तित्व-बोध। जब किसी समुदाय की पहचान, अधिकार, सामाजिक स्थिति और अनुभवों को केंद्र में रखकर साहित्यिक एवं सामाजिक विचार किया जाता है, तो उसे अस्मितामूलक विमर्श कहा जाता है।
हिंदी साहित्य में प्रमुख अस्मितामूलक विमर्श
1. दलित विमर्श
दलित विमर्श में जातिगत भेदभाव, सामाजिक शोषण, अस्पृश्यता, समानता और सम्मान जैसे प्रश्न प्रमुख हैं।
दलित साहित्य अपने अनुभवों को स्वयं व्यक्त करने और सामाजिक अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने पर जोर देता है।
प्रमुख लेखक: ओमप्रकाश वाल्मीकि, तुलसीराम, मोहनदास नैमिशराय, कंवल भारती आदि।
प्रमुख कृति: जूठन — ओमप्रकाश वाल्मीकि।
2. स्त्री विमर्श
स्त्री विमर्श में महिलाओं के अधिकार, स्वतंत्रता, लैंगिक असमानता, पितृसत्ता, शिक्षा और आत्मनिर्भरता से जुड़े प्रश्न उठाए जाते हैं।
प्रमुख लेखिकाएँ: महादेवी वर्मा, कृष्णा सोबती, मन्नू भंडारी, मृदुला गर्ग, मैत्रेयी पुष्पा, प्रभा खेतान आदि।
Book Specifications
| Author | Dr. Rajesh Kumar |
| Language | Hindi |
| Publisher | Neeraj Publications |
| ISBN | 9789393088734 |
| Format | Paperback |
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