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IGNOU BOOK | Bhartiya Kavyashastra | HINDI MEDIUM | BHDC-106

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भारतीय काव्यशास्त्र

भारतीय काव्यशास्त्र भारतीय साहित्य की वह शास्त्रीय परंपरा है जिसमें काव्य के स्वरूप, उद्देश्य, सौंदर्य, गुण-दोष, अलंकार, रस, ध्वनि और काव्य-भाषा आदि का व्यवस्थित अध्ययन किया जाता है। इसका विकास संस्कृत साहित्य में हुआ और बाद में इसका प्रभाव हिंदी सहित अन्य भारतीय भाषाओं के काव्य पर पड़ा।

भारतीय काव्यशास्त्र की प्रमुख अवधारणाएँ

  • रस सिद्धांत: काव्य का प्रमुख उद्देश्य पाठक के मन में सौंदर्यात्मक आनंद उत्पन्न करना है। भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र में रस सिद्धांत का प्रतिपादन किया। प्रमुख रस हैं—श्रृंगार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, बीभत्स, अद्भुत और शांत।
  • अलंकार सिद्धांत: काव्य की शोभा बढ़ाने वाले विशेष तत्वों को अलंकार कहा जाता है। जैसे—उपमा, रूपक, अनुप्रास, उत्प्रेक्षा आदि।
  • रीति सिद्धांत: आचार्य वामन ने रीति को काव्य की आत्मा माना। काव्य में शब्दों की विशेष रचना और शैली को रीति कहा जाता है।
  • ध्वनि सिद्धांत: आचार्य आनंदवर्धन ने ध्वनि को काव्य का अत्यंत महत्वपूर्ण तत्व माना। इसमें प्रत्यक्ष अर्थ के पीछे छिपा या व्यंग्यार्थ प्रमुख होता है।
  • वक्रोक्ति सिद्धांत: आचार्य कुंतक के अनुसार काव्य की विशेषता उसकी वक्र या विशिष्ट अभिव्यक्ति में होती है।
  • औचित्य सिद्धांत: आचार्य क्षेमेन्द्र ने काव्य में पात्र, परिस्थिति, भाषा, भाव और कथानक के उचित सामंजस्य को महत्व दिया।


Book Specifications

AuthorDr. Rajesh Kumar
LanguageHindi
PublisherNeeraj Publications
ISBN9789393088284
FormatPaperback

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